चहरे पर भर पडता है ऐने मे रूप
गगन पर छोडतो तुम सुरज का धुप।
हवाओ पर निर्भर करता है पत्तो का वेग
बावर्ची पर भर पडता है पकवान का महेक।

परिवार के सदस्य लिखते है घर के सुख
आदमी अपना औरत से कर नही पाता है रूख।
ईश्क की बात ना हो तो अधुरा सा रहता है लेख
सुरू ही नही कर पाता हुँ सुबह, तुम्हे देख।